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संकल्प
(यजुर्वेद अध्याय 34 मंत्र 1-6)
यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति
दूरंगमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।
दूर जाता जागरण में जो बहुत
और उतना ही चला करता
जब सब सुप्त रहते
ज्योतियों में ज्योति जो है एक
वही मेरा मन
सदा शिव संकल्पकारी हो ।
येन कर्माण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीराः
सदपूर्वं यक्षमन्तः प्रजानां तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।
कर्म में होते निरत जिससे मनीषी
व्रती का संकल्प पूरा कराता जो
यज्ञ में बन शक्ति अद्भुद् जो प्रतिष्ठित
वही मेरा मन
सदा शिव संकल्पकारी हो ।
यत्प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च यज्ज्योतिरन्तरमृतं प्रजासु
यस्मान्न ऋते किं चन कर्म क्रियते तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।
ज्ञानमय, विज्ञानमय, धृतिशील
सब प्राणियों में जो रहा करता
है तेज बनकर
नहीं किंचित् कर्म होता बिना जिसके
वही मेरा मन
सदा शिव संकल्पकारी हो ।
येनेदं भूतं भुवनं भविष्यत् परिगृहीतममृतेन सर्वम्
येन यज्ञस्तायते सप्तहोता तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।
भूत, भावी, सतत वह जो
अमृतवत् सबकुछ संजोता
हविर्दाता सात रूपों में
जगत विस्तार करता
वही मेरा मन
सदा शिव संकल्पकारी हो ।
यस्मिन्नृचः साम यजूंषि यस्मिन् प्रतिष्ठिता रथनाभाविवाराः
यस्मिश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु ।
अरे जैसे चक्र में रथ के हुआ करते
साम, ऋक्,यजु में प्रतिष्ठित वह
प्राणियों के चित्त ओत प्रोत जिससे
वही मेरा मन
सदा शिव संकल्पकारी हो ।
सुसारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान्नेनीयतेऽभीशुभिर्वाजिन इव
हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।
सारथी रथ की कुशल वल्गा लिए
नियंत्रित गतिशील कर ज्यों अश्वदल
अथक् द्रुत जो
प्रणियों के हृदय स्थित
वही मेरा मन
सदा शिव संकल्पकारी हो ।
संकल्प
(यजुर्वेद अध्याय 34 मंत्र 1-6)
यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति
दूरंगमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।
दूर जाता जागरण में जो बहुत
और उतना ही चला करता
जब सब सुप्त रहते
ज्योतियों में ज्योति जो है एक
वही मेरा मन
सदा शिव संकल्पकारी हो ।
येन कर्माण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीराः
सदपूर्वं यक्षमन्तः प्रजानां तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।
कर्म में होते निरत जिससे मनीषी
व्रती का संकल्प पूरा कराता जो
यज्ञ में बन शक्ति अद्भुद् जो प्रतिष्ठित
वही मेरा मन
सदा शिव संकल्पकारी हो ।
यत्प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च यज्ज्योतिरन्तरमृतं प्रजासु
यस्मान्न ऋते किं चन कर्म क्रियते तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।
ज्ञानमय, विज्ञानमय, धृतिशील
सब प्राणियों में जो रहा करता
है तेज बनकर
नहीं किंचित् कर्म होता बिना जिसके
वही मेरा मन
सदा शिव संकल्पकारी हो ।
येनेदं भूतं भुवनं भविष्यत् परिगृहीतममृतेन सर्वम्
येन यज्ञस्तायते सप्तहोता तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।
भूत, भावी, सतत वह जो
अमृतवत् सबकुछ संजोता
हविर्दाता सात रूपों में
जगत विस्तार करता
वही मेरा मन
सदा शिव संकल्पकारी हो ।
यस्मिन्नृचः साम यजूंषि यस्मिन् प्रतिष्ठिता रथनाभाविवाराः
यस्मिश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु ।
अरे जैसे चक्र में रथ के हुआ करते
साम, ऋक्,यजु में प्रतिष्ठित वह
प्राणियों के चित्त ओत प्रोत जिससे
वही मेरा मन
सदा शिव संकल्पकारी हो ।
सुसारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान्नेनीयतेऽभीशुभिर्वाजिन इव
हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।
सारथी रथ की कुशल वल्गा लिए
नियंत्रित गतिशील कर ज्यों अश्वदल
अथक् द्रुत जो
प्रणियों के हृदय स्थित
वही मेरा मन
सदा शिव संकल्पकारी हो ।