Tuesday, 7 February 2012

Shiva Sankalp Sukta from Yajurveda for self improvement first

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                                        संकल्प

              (यजुर्वेद अध्याय 34 मंत्र 1-6)

यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति

दूरंगमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।

दूर जाता जागरण में जो बहुत

और उतना ही चला करता

जब सब सुप्त रहते

ज्योतियों में ज्योति जो है एक

वही मेरा मन

सदा शिव संकल्पकारी हो ।

येन कर्माण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीराः

सदपूर्वं यक्षमन्तः प्रजानां तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।

कर्म में होते निरत जिससे मनीषी

व्रती का संकल्प पूरा कराता जो

यज्ञ में बन शक्ति अद्भुद् जो प्रतिष्ठित

वही मेरा मन

सदा शिव संकल्पकारी हो ।

यत्प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च यज्ज्योतिरन्तरमृतं प्रजासु

यस्मान्न ऋते किं चन कर्म क्रियते तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।

ज्ञानमय, विज्ञानमय, धृतिशील

सब प्राणियों में जो रहा करता

है तेज बनकर

नहीं किंचित् कर्म होता बिना जिसके

वही मेरा मन

सदा शिव संकल्पकारी हो ।

येनेदं भूतं भुवनं भविष्यत् परिगृहीतममृतेन सर्वम्

येन यज्ञस्तायते सप्तहोता तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।

भूत, भावी, सतत वह जो

अमृतवत् सबकुछ संजोता

हविर्दाता सात रूपों में

जगत विस्तार करता

वही मेरा मन

सदा शिव संकल्पकारी हो ।

यस्मिन्नृचः साम यजूंषि यस्मिन् प्रतिष्ठिता रथनाभाविवाराः

यस्मिश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु ।

अरे जैसे चक्र में रथ के हुआ करते

साम, ऋक्,यजु में प्रतिष्ठित वह

प्राणियों के चित्त ओत प्रोत जिससे

वही मेरा मन

सदा शिव संकल्पकारी हो ।

सुसारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान्नेनीयतेऽभीशुभिर्वाजिन इव

हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।

सारथी रथ की कुशल वल्गा लिए

नियंत्रित गतिशील कर ज्यों अश्वदल

अथक् द्रुत जो

प्रणियों के हृदय स्थित

वही मेरा मन

सदा शिव संकल्पकारी हो ।

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