Tuesday, 24 April 2012

Review of Girirajkishor's Swarn mrig-


समीक्षा
वैश्वीकरण की मृग मरीचिका
                    प्रभुदयाल मिश्र

राजपाल दिल्ली से प्रकाशित श्री गिरिराज किशोर का ‘स्वर्णमृग’’ उपन्यास वैश्वीकरण की उस वैयक्तिक त्रासदी पर केन्द्रित है जो हमें रातों रात ‘मिलयोनियर’ बनने का सपना संजेाने और अन्ततः एक बेरहम चौराहे पर छोड़ने के लिए कुख्यात हो चुकी है । आज जिस तरह हमारा राष्ट्रीय जीवन आतंकवाद के साये में रहने के लिए अभिशप्त है, और कम्पूटर वायरस के द्वारा निगले जाने के लिए सहमा हुआ है, ठीक वैसे ही हम लैपटाप पर बैठकर बुढ़ापे को ढोने के लिए संजोई जीवन भर की कमाई किसी एक क्लिक पर लुटाने को आमादा हैं । जब सरकारी डाकखाने चिटिठयां ‘खाने’ लगे हों तो कमसे कम ईमेल की खतिर तो कम्पूटर अब सभी की आवश्यकता हो गई है । किन्तु इस पर ऐसे पत्रों की ही प्रायः भरमार रहती है जो अदृश्य से आकर ‘कंचन मृग’ की सुन्दर छाल के लिए सभी लोक और सभी काल में चलने वालेां को भरमाती रही है ।
प्रश्न यह उठता है कि वैश्वीकरण का यह क्या वह पक्ष नहीं है जिसके लिए हम अपनी आदत के मुताबिक सीधे अमेरिका अथवा पश्चिम को कोस कर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं? सामान्य तौर पर हम इसे अर्थिक उदारीकरण से होते हुए बहुराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के उस संदर्भ में ही कोसते आए हैं जो हमारे बाम पन्थी बन्धुओं को तत्समय रूस और अब चीन के आदर्श से दूर खींचती लगती है । साधारणतया इस न्याय से हमारे तथाकथित ‘समाजवादी’ बन्धुओं का तो कोई सरोकार ही नहीं होना चाहिए क्योंकि वे लोभ जनित धन संग्रह की प्रवृत्ति से अपने आपको सदा ऊपर रखते आए हैं! इस प्रकार हमारा प्रश्न यही बनता है कि क्या यह कहानी सामाजिक न होकर उस वैयक्तिक भूमिका मात्र की ही नहीं है जो उस पिपासा से उत्पन्न होती है जिसकी कभी तृप्ति ही नहीं हुई है? जब याज्ञवल्क्य ने अपनी पत्नी मैत्रेयी को कहा कि यदि वह संसार की सारी संपत्ति की स्वामिनी बनकर भी अमृतत्व नहीं पा सकती तो उसने तुरंत अपना हिस्सा कात्यायनी को देने का निर्णय ले लिया । अर्थात् क्या हम अपनी इस अनन्त पिपासा का दोष वैश्वीकरण पर डालकर क्या सही अनुसंधान की दिशा में हैं?
‘‘ मैं वैश्वीकरण के विकीरण (विकिरण!)के इस कोढ़ से अपने लोगों को अपने अनुभवों के जरिए बचाना चाहता हूं । वैश्वीकरण तीसरी दुनियां के लोगों के लिए आणविक विस्फोट के फाल आउट की तरह लगता है । आणविक विभाजन और वैश्वीकरण जुड़वां भाई की तरह हैं ।’ पृष्ठ 23
आज साइबर क्राइम्स कम्पूटर विधा के साथ ठीक वैसे ही एकाकार हो गए हैं जिस तरह परमाणु की रचनात्मक और विध्वंशक दिशायें । अब यदि विज्ञान वरदान के साथ अभिशाप है तो इसे हमने छोड़ा कब है? ठीक वही समस्या क्या इसके उपजीव्य वैश्वीकरण से उत्पन्न नहीं  हुई है ?
इस प्रस्तावना के साथ मैं यह कहना चाहता हूं कि श्री गिरिराज किशोर के इस समीक्ष्य उपन्यास के कथानायक श्री पुरुषो के गहन संवेदना जन्य गृह त्याग के साथ उनका ब्रिटानी मूर के साथ इस ‘मिराज वाटर परियोजना’ का अनथक ईमेल संवाद कितना मेल खाता है, इसे स्वीकार करने के लिए हमें ईस्ट इज ओनली ईस्ट एण्ड नो वेस्ट के रटे हुए कथन पर ही सदा के लिए नहीं टिक रहना होगा ?
किन्तु यह स्वीकार करना सर्वथा उचित है कि लेखक ने जिस बारीक और प्रामाणिक तकनीकी अनुभव के आधार पर एक सीमित कथानक का विस्तार किया है वह एक सिद्धहस्त लेखक की क्षमता का ही कमाल हो सकता है ।
शिल्पगत दृष्टि से भी इस कथानक में रोचकता है । लेखक अपने ज्ञान, संवेदना और सामाजिक सरोकार में लगातार उपस्थित और सचेत है ।
पुस्तक- स्वर्णमृग
लेखक- गिरिराजकिशोर
प्रकाशक-राजपाल, दिल्ली
मूल्य- 145 रुपये                                         35, ईडन गार्डन, राजाभोजमार्ग, भोपाल, 16
                                                                                             
pdmishrabpl67@hotmail.com

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