Monday, 9 April 2012

Tauji -Smaran/Tarpan


23. ताऊ

तुम्हारा तब होना भी
अखिर कैसा होना था
जब आंगन की ओर बढ़ती धूप
दो डग पर ही ठहर गई
टूटी दीवार की छाया में
ज्यों का त्यों खड़ा रहा तुलसी घर
और हवा और रौशनी से बुना विश्वास
ओड़े रहा छिन-छिन
पल-पल
अविचल
एक छोटे दिये का प्रकाश !

कद काठी में अपने भाई से थे तुम बड़े
किन्तु वे तुमसे और तुम उनसे
कई मामलों में कड़े थे
इसीसे तुमने कभी नहीं काटी
अपने घर के सहमे पिछवाड़े में उग रही गाजर घास
और पास ही अपने बन्धुग्रह तुमने
उगाया अमलतास
दूर गंधमादन से लाकर
भरते रहे उसमें सुबास

मैंने तुम्हें नहीं देखा
किन्तु कंटीली झाड़ी की चुभन
अथवा मोटे गट्ठर के बोझ से
तुम्हारे अनुज ने जब भी कभी ली उसंk
अथवा बहुत सारे दिनों की धूप सा तपा माथा
या बरोसी से बुझ गए ठंडे दिन
से ताई के हाथों ने जब मेरा चेहरा सहलाया
मैंने तुम्हारा आभास पाया

तुम बहते ही रहे बनकर लहू
मेरे घुटनों में लगी बार बार की चोट से
आम और जामुन की बौछार से
पड़े रहे पेड़ के नीचे
अलस्सुबह
रोटी सने गुनगने दूध की सी तुम मिठास
मेरे कितने पास
सचमुच कितने पास हो !www.vishwatm.com

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